कांग्रेस राज में मीडिया वालों के लिए एडवाइजरी आती थी, भाजपा शासनकाल में सीधे आदेश आते हैं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

कांग्रेस राज में मीडिया वालों के लिए एडवाइजरी आती थी, भाजपा शासनकाल में सीधे आदेश आते हैं : पुण्य प्रसून बाजपेयी

यादों में आलोक – “सत्यातीत पत्रकारिता : भारतीय संदर्भ”… दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में शनिवार को आयोजित एक सेमिनार में देश में मीडिया की दशा-दिशा पर चर्चा हुई। विषय था, “सत्यातीत पत्रकारिता भारतीय संदर्भ”। संचालन रमाशंकर सिंह ने किया और बताया कि अंग्रेजी के पोस्ट ट्रुथ जनर्लिज्म के लिए कुछ लोगों ने “सत्योत्तर पत्रकारिता” का सुझाव दिया था पर सत्योत्तर और सत्यातीत पत्रकारिता में अंतर है और आखिरकार सत्यातीत का चुनाव किया गया।

सबसे पहले आईटीएम विवि के पत्रकारिता विंभाग के जयंत तोमर ने आलोक तोमर के लेखन व पत्रकारिता पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। विषय प्रवर्तन (भारत सरकार के) भारतीय जनसंचार संस्थान के आनंद प्रधान ने किया और मुख्य वक्ताओं में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, पुण्य प्रसून वाजपेयी और राजदीप सरदेसाई रहे। एनके सिंह भी आने वाले थे, नहीं आए। इस बारे में रमाशंकर सिंह ने लिखा है, “वक़्ता के रूप में सहमति देकर भी एन के सिंह न जाने क्यों नहीं आये?”

सबने वही कहा जो उनसे अपेक्षित था। फिर भी सूचनाप्रद और दिलचस्प। उर्मिलेश ने अपने अनुभव से कुछेक उदाहरण दिए और कहा कि सत्यातीत पत्रकारिता काफी समय से हो रही है। राजदीप सरदेसाई ना विवाद में गए और ना विवाद से बचने की कोशिश करते दिखे (मैंने उन्हें पहली बार सुना) और विषय पर केंद्रित रहे। उन्होंने कहा कि तकनीक है, समाज में बदलाव आया है उसका असर है। खबर सही हो या गलत खबर है तो कुछ ही देर में फैल जाती है और यह इनमें गढ़ी हुई तथा गलत खबरें भी होती हैं। उन्होंने भी अच्छे उदाहरण दिए। पुण्य प्रसून वाजपेयी का यही कहना था कि स्थिति लगातार खराब हो रही है। पहले एडवाइजरी आती थी अब आदेश आते हैं। राम बहादुर राय ने मीडिया आयोग बनाने की मांग की और इस बारे में अपने प्रयासों की जानकारी दी।

राम बहादुर राय ने अपनी 2008 से जारी मीडिया कमीशन की मांग को जारी रखा। उन्होंने तमाम उतार-चढ़ाव, बदलाव के दौर से गुजर रही पत्रकारिता के लिए पचास के दशक, फिर सत्तर के दशक में लाए गए प्रेस आयोग का जिक्र करते हुए इसे एक बार फिर मौजूं बताया। राम बहादुर राय ने कहा कि इस पत्रकारिता का भला तभी हो सकता है, जब पत्रकार अपना दायित्व, कर्तव्य दोनों ईमानदारी के साथ समझे। उसे निभाए। वह संसद भवन में राज्य सभा सदस्य बनकर प्रवेश करने का सपना देखना छोड़ दे। पत्रकारिता और लोकतंत्र दोनों का भला हो जाएगा।

मैं समझ रहा था कि राम बहादुर राय को सरकार के करीबी होने के नाते बुलाया गया था पर उन्होंने कहा कि वे आलोक से संबंधों और उनकी पत्नी सुप्रिया के निमंत्रण पर आए हैं और ज्यादातर लोग इसीलिए आए हैं।

मैं हर साल इस आयोजन में जाता रहा हूं। आलोक और सुप्रिया भाभी से करीबी भी इसकी वजह है पर मुख्य मसला तो पत्रकारिता पर चर्चा है। जो प्रिय है। और इसीलिए हर साल जाने के लिए समय निकाल पाया। नहीं तो किसी की याद में कहां हर साल ऐसे आयोजन होते हैं और कौन हर साल जाता है। फिर भी। कुल मिलाकर, अंत में भड़ास फॉर मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह का कहा ही ठीक लगा कि आंख वालों ने हाथी की व्याख्या अपने-अपने हिसाब से कर दी। पत्रकारिता रूपी हाथी को जो अपने हिसाब से हांक लेता था (आलोक तोमर) वो तो रहा नहीं।
वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कार्यक्रम में किसने क्या कहा…
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पत्रकारिता का पूरा परिदृश्य बदल गया है। अब संपादक को पता नहीं होता कि कब कहाँ से फोन आ जाए। संपादकों के पास कभी पीएमओ तो कभी किसी मंत्रालय से सीधे फोन आता है। ये फ़ोन सीधे खबरों को लेकर होते हैं और संपादकों को आदेश दिए जाते हैं। मीडिया पर सरकारों का दबाव पहले भी रहा है, लेकिन पहले एडवाइजरी आया करती थी कि इस खबर को न दिखाया जाए, इससे दंगा या तनाव फैल सकता है। अब सीधे फोन आता है कि इस खबर को हटा लीजिए। खुद मेरे पास प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आते हैं और अधिकारी बाकायदा पूछते हैं कि अमुक खबर कहां से आई? ये अफसर धड़ल्ले से सूचनाओं और आंकड़ों का स्रोत पूछते हैं। अक्सर सरकार की वेबसाइट पर ही ये आंकड़े होते हैं लेकिन सरकार को ही नहीं पता होता। जब तक संपादक के नाम से चैनलों को लाइसेंस नहीं मिलेंगे, जब तक पत्रकार को अखबार का मालिक बनाने की अनिवार्यता नहीं होगी, तब तक कॉर्पोरेट का दबाव बना रहेगा। राजनैतिक पार्टियों के काले धंधे में बाबा भी शामिल हैं। बाबा टैक्सफ्री चंदा लेकर नेताओं को पहुंचाते हैं। जल्द ही मैं इसका खुलासा स्क्रीन पर करूंगा।
-टीवी जर्नलिस्ट पुण्य प्रसून बाजपेयी

पत्रकारिता में झूठ की मिलावट बढ गई है। किसी के पास भी सूचना या जानकारी को छानने और परखने की फुरसत नहीं है। गलत जानकारियाँ मीडिया मे खबर बन जाती हैं। इसके लिए कॉर्पोरेट असर और टीआरपी के प्रेशर को दोष देने से पहले पत्रकारों को अपने गिरेबां मे झाँककर देखना चाहिए कि हम कितनी ईमानदारी से सच को लेकर सजग हैं।
-टीवी जर्नलिस्ट राजदीप सरदेसाई

भारत में पठन पाठन प्राचीन से मध्य काल तक कुछ लोगों के हाथों में रहा हैं। पत्रकारिता में सत्यातीत बोध हमारे समाज में लगातार चलता रहा है और आधुनिक काल मे भी चल रहा है। सच्चाई से परे तमाम खबरें आती रहती हैं जो दलितों, पिछड़ों आदिवासियों के खिलाफ होती हैं।
-वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश

(साभार : भड़ास फॉर मीडिया)

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