जाति है कि जाती नहीं: कौन फैला रहा है जातिवाद का जहर इस देश में

जाति है कि जाती नहीं: कौन फैला रहा है जातिवाद का जहर इस देश में

जब देश के प्रथम दलित नागरिक राष्ट्रपति को ब्रम्हामन्दिर में प्रवेश नहीं तो आम दलित की बिसात क्या? ब्रम्हा मन्दिर पुष्कर में महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद को दलित होने के कारण जब सीढ़ियों पर ही करनी पड़ी पूजा-अर्चना.

मैं इसकी किन शब्दो में ब्याख्या करूँ कि देश के राष्ट्रपति अर्थात प्रथम नागरिक को पुष्कर स्थित ब्रम्हा मन्दिर में भगवान ब्रम्हा का पूजन -अर्चन नहीं करने दिया गया और वे मंदिर से बाहर सीढ़ियों पर ही सपरिवार पूजन कर लौट गए। यह अलग बात है कि अखबारों ने छापा की राष्ट्रपति जी की पत्नी के पैर सीढ़ियों पर चढ़ने में कठिनाई महसूस कर रहे थे इसलिए वे लोग बाहर सीढ़ियों पर ही पूजन-अर्चन कर लौट आये।

यह तर्क कत्तई सुपाच्य नहीं है क्योंकि वे प्लेन पर चढ़ती होंगी, तमाम जगहों पर सीढियां चढ़ती होंगी और यदि यह भी मान लिया जाय कि वे सीढियां नहीं चढ़ पाती होंगी तो जो इतनी श्रद्धा से भगवान ब्रम्हा का दर्शन करने गया हो वह यूं ही सीढ़ियों पर पूजन-अर्चन कर लौट नहीं सकता, चाहे जितनी कठिनाई हो वह अपने आराध्य का दर्शन जरूर करेगा।

हिन्दू धर्म बड़ा अजीब है। पूरी बसुधा कुटुंब है केवल 85 प्रतिशत दलित/पिछड़ी तथाकथित हिन्दू धर्म मानने वाली छूत/अछूत पिछड़ी/दलित जातियों को छोड़कर। जानवर गाय माता है, चूहा गणेश है, गिद्ध जटायुराज है, सूवर बाराह भगवान है, बंदर हनुमान है, भालू जामवंत है लेकिन इंसान शम्बूक दुष्ट है, एकलब्य अपराधी है।

राष्ट्रपति का पद देश का सर्बोच्च पद है। इससे बड़ा कोई नहीं है। राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक है। देश की सारी शक्तियां हमारे राष्ट्रपति में समाहित हैं। तीनों सेनाओं के वे सेनाध्यक्ष हैं लेकिन जाति से दलित हैं तो उनका सारा कुछ बेमतलब और जाति महत्वपूर्ण हो जाती है।

मैं यह देख और जानकर हतप्रभ रह गया कि महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद जी को पुष्कर स्थित ब्रम्हा मन्दिर के गर्भ गृह अथवा परिक्रमा स्थल तक जाने नहीं दिया गया। वे सीढ़ियों पर ही ब्रम्हा भगवान का पूजन कर वापस लौट आये। राष्ट्रपति महोदय को विजिटर बुक भी नहीं दिया गया जिसमें वे अपना संस्मरण लिख सकें कि ब्रम्हा मन्दिर आकर उन्हें कैसा लगा?

मुझे लगता है राष्ट्रपति महोदय को विजिटर बुक न देने के दो कारण पुजारियों के दिमाग में रहे हों, पहला कि विजिटर बुक राष्ट्रपति महोदय से छूकर कहीं अपवित्र न हो जाए और दूसरा कि कहीं वे अपने सीढ़ी पर पूजन करने को अपमान समझ उसमें इसे विजिटर बुक में दर्ज न कर दें।

खैर महामहिम का सीढ़ियों पर पूजन-अर्चन करना मुझे खल रहा है। मैं महामहिम को यह तो नहीं कह सकता कि वे मन्दिर न जांय, पूजा न करें क्योकि सबकी अपनी-अपनी धारणाएं, आस्थाएं और मान्यताएं हैं। राष्ट्रपति जी घोर हिन्दू हैं तो उन्हें मंदिर जाना हो तो जरूर जांय लेकिन पद की गरिमा का जरूर ख्याल रखा जाना चाहिए।

राष्ट्रपति जी फिलहाल केवल रामनाथ कोविद नहीं हैं बल्कि वे देश के मुकुट है, सर्वश्रेष्ट हैं। राष्ट्रपति जी से इस देश के 125 करोड़ भारतीयों का मान-सम्मान जुड़ा हुआ है। राष्ट्रपति जी का अपमान उनका निजी अपमान नहीं वरन देश के 125 भारतीयों का अपमान है क्योंकि वे देश के राष्ट्रपति हैं। इसलिए मर्यादा का ख्याल पूरे देश को और हम सबको रखना है।

ठीक है राष्ट्रपति जी कहीं ऐसी जगह जा रहे हैं जहां जाने से जाति के नाते यथा मानवोचित सम्मान उनको न मिले तो उसे गोपनीय रखा जाय या सार्वजनिक कर दिया जाए, प्रेस में रिलीज किया जाय या न किया जाय, इस पर दो मत हो सकते हैं और इसलिए यह बहस का विषय है। लेकिन देखा गया है कि धर्म के तथाकथित नकली ठेकेदार -पंडित, पुरोहित हमेशा बुद्धिजीवियों की बहस से दूर भागते हैं.

धर्म की मान्यताओं का पालन करते हुए उस धार्मिक व्यवस्था को सर-आंखों पर ले लिया जाय, इससे किसी को कोई ऐतराज नहीं होगा लेकिन ऐसे धर्म का क्या मतलब है जो इंसान-इंसान में भेद करता हो? मेरे ख्याल से महामहिम का वह कार्यक्रम सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि हमारे धर्म का एक काला पक्ष दुनिया के सामने उजागर हो भलें इससे राष्ट्रपति जी का ही नहीं बल्कि पूरे 125 करोड़ भारतीयों का अपमान होता हो तो हो।

मैं भगवान ब्रम्हा पर कुछ नहीं कहूंगा क्योकि उन पर ज्योतिबा फुले जी ने विस्तार से लिख रखा है। जिन्हें भगवान ब्रम्हा को जानना हो वे फुले जी के सम्पूर्ण वांगमय को पढ़ लें उसमे विस्तार से ब्रम्हाजी का इतिहास मिल जाएगा।

महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविद जी! आपके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद हमारे जैसे लोग काफी खुश हुए थे कि चलो कम से कम किसी विधि से उस कुर्सी तक कोई दलित पँहुचा तो जिसे देखने तक को बहुजन समाज तरस जाता था। आप स्वयं हिमांचल स्थित राष्ट्रपति के गेस्ट हाउस से राष्ट्रपति बनने से पहले लौटा दिए गए थे जबकि अब आप राष्ट्रपति बन चुके हैं।

यह हम बहुजनो के लिए प्रसन्नता का सबब है लेकिन हम सबको ऐसी परिस्थितियो से पद की गरिमा को बचाये रखना भी आवश्यक है जिससे देश और दुनिया शर्मिंदगी महसूस न करने पाए.

-चन्द्र भूषण सिंह यादव, अमर स्नेह की फेसबुक वॉल से साभार

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