बलिदान दिवस: रानी लक्ष्मीबाई की याद में आंसू बहाता है झांसी, किया जाता है दीपदान

बलिदान दिवस: रानी लक्ष्मीबाई की याद में आंसू बहाता है झांसी, किया जाता है दीपदान

18 जून 1958 में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गई थीं. आज भी दुनिया उन्हें झांसी की रानी के नाम से जानती है. उनके बलिदान दिवस को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. पूरा इलाका दीपदान करता है और अपनी वीर रानी को याद करता है.

झांसी: 18 जून 1958 में रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गई थीं. आज भी दुनिया उन्हें झांसी की रानी के नाम से जानती है. उनके बलिदान दिवस को शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. पूरा इलाका दीपदान करता है और अपनी वीर रानी को याद करता है.

19 नवंबर 1927 को लक्ष्मीबाई का जन्म बनारस में हुआ था. हालांकि कुछ लोग इसे 1935 बताते हैं. उनकी मां का नाम भागीरथी और पिता का नाम मोरेपंत तांबे था. रानी को बचपन में मणिकर्णिका कहा जाता था.

किशोरावस्था में ही हुआ था विवाह विवाह

इतिहासविद ओमशंकर असर ने अपनी किताब झांसी क्रांति काशी में लिखा है कि झांसी के राजा गंगाधर राव से उनकी शादी महज 15 वर्ष की कच्ची उम्र में सन 1842 को हुई थी. रानी का जन्म 19 नवंबर 1827 को काशी में हुआ था. सन 1851 में उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई मगर चंद महीने की आयु में उनके बेटे की मौत हो गई. इससे पूरे शहर में मातम छा गया था. राजा ने कुछ दिनों बाद एक पुत्र को गोद लिया. उसका नाम दामोदर राव रख दिया गया.

झांसी के राजा के निधन के बाद आया जीवन में तूफान

पुत्र शोक राजा गंगाधर राव नहीं झेल सके और 21 नवंबर 1853 को उनकी मौत हो गयी. राजा की मौत के बाद जनरल डलहौजी ने दत्तक दामोदर राव को झांसी का उतराधिकारी मानने से इनकार कर दिया. लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की इस बात का पुरजोर विरोध किया. ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ युद्ध करने का एलान कर दिया गया. दोनों हाथों में तलवार लेकर घोड़े पर सवार और पीठ पर दत्तक पुत्र को बांधकर यह शेरनी अंग्रेजों पर टूट पड़ी. विदेशी फौज को अब लक्ष्मी बाई के युद्ध कौशल का अंदाजा हो चला था

अंग्रेजों की सेना के आगे बहुत कमजोर थी देसी सेना

झांसी की सेना अंग्रेज सेना के मुकाबले बहुत कम थी, इसके बावजूद भी यहां के सैनिक पूरी वीरता के साथ दुश्मनों का डटकर मुकाबला कर रहे थे. परन्तु धन और सेना की कमी होने के कारण अंग्रेजों ने झांसी के किले पर कब्जा कर लिया. फौज से उनका युद्ध लगातार जारी था. ग्वालियर के पास अचानक एक गोली उनके पैर में आ लगी और उनकी गति धीमी हो गयी जिसके कारण अंग्रेजों ने रानी को चारों तरफ से घेर लिया था. एक अंग्रेज सैनिक ने लक्ष्मी के पीछे से उनके सिर पर वार कर दिया.

अंतिम सांस तक जीवट

ग्वालियर के पास घनघोर युद्ध हुआ. 18 जून 1858 को जख्मी हो जाने के बाद कुछ सैनिकों ने रानी को बाबा गंगादास की कुटिया में पहुंचाया और कुटिया में जल पीने के बाद लक्ष्मी बाई ने दम तोड़ दिया. महारानी चाहती थीं कि उनके मरने के बाद अंग्रेज उनके शव को हाथ न लगाएं.

ऐसे बना था झांसी किला

वरिष्ठ पत्रकार किशन गुप्ता नादान बताते हैं कि झांसी शहर असल में ओरछा रियासत के सहयोग से बनाया गया था. एक पहाड़ी पर 15 एकड़ में बने यहां के किले की नींव 1602 में ओरछा नरेश वीर सिंह जूदेव द्वारा रखी गयी थी. 11 साल का समय लगा और यह 1613 में बनकर तैयार हुआ.

जब यह किला निर्माणाधीन था तब ओरछा नरेश से मिलने जैतपुर के राजा आये. जैतपुर के राजा को अपने किले की छत पर ले जाकर हाथ से इशारा करते हुए ओरछा नरेश ने पूछा देखिए आपको कुछ नजर आ रहा है? इस पर राजा जैतपुर ने गहराई से देखते हुए कहा कि बलवंत नगर की पहाड़ी पर कुछ झाँइ सी (धुंधला सा) नजर आ रही है.

ओरछा नरेश खुश होते हुए कहा कि आज से नाम झाँइसी होगा. कालान्तर में इसका नाम बदलकर झांसी हो गया. एमपी के टीकमगढ़ जनपद का छोटा सा कस्बा ओरछा झांसी से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर है. कभी यह सशक्त ओरछा राज्य था और झांसी को उस वक्त नाम बलवंतनगर था.

मराठाओं के कब्जे में आया झांसी

महाराष्ट्र समाज के पुरोहित गजानन खनवलकर ने बताया कि ओरछा नरेश के नियंत्रण से निकलकर बाद में झांसी मराठा पेशवाओं के अधीन आ गयी. पेशवाओं ने सूबेदारों की मदद से यहां शासन किया. ओरछा नरेश से संबंधित गुसाईं यहां के किलेदार बने, जिन्हें बाद में पेशवा के मराठा सूबेदारों ने हटा दिया. गुसाईं और मराठा पेशवाओं ने भी किले मे कई अन्य इमारतों और स्थलों का निर्माण कराया.

किले में क्या क्या है

किले में पाताली कुंआ, गुलाम गौस खाँ, मोती बाई व खुदा बख्श की समाधि स्थल कारावास, काल कोठरी, शिव मंदिर, फांसी घर, पंच महल, और महारानी का छलांग स्थल महत्वपूर्ण जगह हैं. गंगाधर राव गद्दारों करने वालों के प्रति बहुत सख्त रवैया अपनाते थे, कहा जाता है कि छोटी गलती पर भी फांसी की सजा दे देते थे. किले के पश्चिमोत्तर किनारे पर फांसी घर बनाया गया था जहां जल्लाद फांसी देता था और नीचे गिरने वाली लाश को उसके घर वालों को दे दिया जाता था या लावारिस होने पर बेतवा नदी में बहा दिया जाता था.

कुशल शासक थीं महारानी

महारानी लक्ष्मीबाई में अव्वल दर्जे की प्रशासनिक समझ थी. उन्होंने राजा से कहकर बिना जांच के छोटी-छोटी बातों पर फांसी पर रोक लगवा दी थी. रानी ने किले में एक कारावास और काल कोठरी बनवायी और राजा को समझाया कि जो भी अपराध करें उन्हें पहले कारावास में रखा जाए और सही रास्ते चलने के लिए उन्हें प्रेरित किया जाए.

बेहद खूबसूरत इमारत है पंचमहल

इसी महल में राजदरबार लगता था. किले की पृष्ठभूमि में निर्मित पंचमहल बेहद खूबसूरत इमारत है जो पांच मंजिला है. इसकी सबसे ऊपरी मंजिल में बनी रसोई में राजा और रानी के लिए खाना बनाया जाता था. सबसे ऊपरी मंजिल को बाद में अंग्रेजों ने तुड़वा दिया और सपाट कर दिया.

बलिदान दिवस पर शोकाकुल होता शहर

इतिहासविद् रमाकांत वर्मा ने बताया कि महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर उनकी याद में शहर में दीपदान किया जाता है. इस दिन वाकई यह महसूस किया जाता है कि पूरा शहर सदमे में है. हजारों संख्या में दीपदान किया जाता है. हर गली मुहल्ले में उनकी याद में दीपदान करके उनके लिए हर आंख नम होती है चाहे वह किसी भी जाति और संप्रदाय से हो.

झांसी और महारानी का रिश्ता

समूचे विश्व में झांसी को महारानी लक्ष्मीबाई के नाम से जाना जाता है. आजादी की प्रथम दीपशिखा वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई वह नाम है जिसने महिला वीरता की एक अमर गाथा लिखी. 400 साल से भी अधिक पहले बना किला उनकी शौर्य गाथा का गवाह है.

(साभार ABP न्यूज)

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