बुंदेलखंड में हीरा-पन्ना की ही नहीं, यहाँ है नौकरियों की भी खान

बुंदेलखंड में हीरा-पन्ना की ही नहीं, यहाँ है नौकरियों की भी खान

एनजीओ मानव कल्याण विकासवादी संस्थान कार्यालय के आगे लगी नौकरी पाने वालों की लंबी कतार से परेशानी किसे और क्यों है? सभी सरकारें बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने में नाकाम रही हैं, फिर अगर कोई निजी संस्थान नौकरी देने का प्रयास कर रहा है तो कुछ लोगों को क्यों तकलीफ होती है?

झाँसी: बुंदेलखंड क्षेत्र की बहुचर्चित एनजीओ मानव कल्याण विकासवादी संस्थान कार्यालय के आगे नौकरी पाने वालों की लंबी कतार बढ़ती जा रही है. काम की तलाश में रोज-रोज जुटता यह हुजूम लगभग वैसा ही है जैसा सरकारी रोजगार कार्यालय में दिखता है. भयंकर बेकारी और बेरोजगारी के आलम में नौकरी या कोई भी काम चाहने वालों का यह सैलाब अपने आप में बहुत कुछ कहता है. लेकिन इन्हीं युवा काम पाने के लिए यह लंबी कतारें देश भर के बेरोजगार युवाओं में बढ़ते असंतोष की बानगीभर है. देशभर में हालात कहीं ज़्यादा ख़राब हैं.

इन बेरोजगार युवाओं ने ही भारी तादद में वोट देकर केंद्र में बीजेपी सरकार के सत्ता में आने का रास्ता साफ किया था. लेकिन वे अपने 2 करोड़ नौकरियाँ पैदा करने के वादे को पूरा करने में नाकाम रहे हैं. इसी से यह हालत पैदा हुई है कि एक अदद नौकरी की तलाश में अच्छे-खासे पढ़े लिखे युवक-युवतियां इधर-उधर भटक रहे हैं, उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है.

भारत में कुल 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. भारत में खासकर युवा तबके में बढ़ती बेरोजगारी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है. केंद्र सरकार की ओर से जारी ताजा आंकड़ों में कहा गया है कि देश की आबादी के लगभग 11 फीसदी यानि 12 करोड़ लोगों को नौकरियों की तलाश है.

सबसे चिंता की बात यह है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है. बेरोजगारों में 25 फीसदी 20 से 24 आयुवर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 17 फीसदी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 साल से ज्यादा उम्र के 14.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है. विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ता बेरोजगारी का यह आंकड़ा सरकार के लिए गहरी चिंता का विषय है.

बेरोजगारों में आधी महिलाएं
वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर केंद्र सरकार की ओर से जारी इन आंकड़ों में महिला बेरोजगारी का पहलू भी सामने आया है. नौकरी की तलाश करने वालों में लगभग आधी महिलाएं शामिल हैं. इससे यह मिथक भी टूटा है कि महिलाएं नौकरी की बजाय घरेलू कामकाज को ज्यादा तरजीह देती हैं. इनमें कहा गया है कि बेरोजगारों में 10वीं या 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद 15 फीसदी है. यह तादाद लगभग 2.70 करोड़ है. तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 16 फीसदी युवा भी बेरोजागारों की कतार में हैं. इससे साफ है कि देश के तकनीकी संस्थानों और उद्योग जगत में और बेहतर तालमेल जरूरी है.

युवाओं को है बेहतर मौके की तलाश
इन आंकड़ों से साफ है कि पढ़े-लिखे युवा छोटी-मोटी नौकरियां करने की बजाय बेहतर मौके की तलाश करते हैं. बेरोजगार युवाओं में लगभग आधे लोग ऐसे हैं जो साल में छह महीने या उससे कम कोई छोटा-मोटा काम करते हैं. लेकिन उनको स्थायी नौकरी की तलाश हमेशा रहती है. कुल बेरोजगारों में ऐसे लोगों की तादाद लगभग 34 फीसदी यानि 1.19 करोड़ है. वर्ष 2001 से 2011 के दौरान 15 से 24 वर्ष के युवाओं की आबादी में दोगुनी से ज्यादा वृद्धि हुई है, लेकिन दूसरी ओर उनमें बेरोजगारी की दर 17.6 फीसदी से बढ़ कर 20 फीसदी तक पहुंच गई है. वर्ष 2001 में जहां 3.35 करोड़ युवा बेरोजगार थे वहीं 2011 में यह तादाद बढ़कर 4.69 करोड़ पहुंच गई. वर्ष 2001 में युवाओं की आबादी एक करोड़ थी जो 2011 में 2.32 करोड़ हो गई यानि इसमें दोगुना से ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई. इसके मुकाबले इस दौरान देश में कुल आबादी में 17.71 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई. इन आंकड़ों से साफ है कि युवाओं की तादाद जहां तेजी से बढ़ रही है वहीं उनके लिए उस अनुपात में नौकरियां घट रही हैं.

अर्थशास्त्र विशेषज्ञों की राय
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि बेरोजगार युवाओं की तेजी से बढ़ती तादाद देश के लिए खतरे की घंटी है और केंद्र सरकार ने अपने वादे के अनुरूप इस मुद्दे पर कोई ध्यान नहीं दिया. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर द स्टडी आफ रीजनल डेवलपमेंट के अमिताभ कुंडू कहते हैं, “यह खतरे की स्थिति है. इन युवाओं ने ही भारी तादद में वोट देकर केंद्र में बीजेपी सरकार के सत्ता में आने का रास्ता साफ किया था. भारी तादाद में रोजगार देने वाले उद्योग नई नौकरियां पैदा करने में नाकाम रहे हैं. इसी से यह हालत पैदा हुई है.” निजी स्तर पर अगर कोई संस्थान इन युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने का प्रयास करता है तो शक की दृष्टि से देखा जाता है और सरकारी मशीनरी द्वारा उसे हतोत्साहित किया जाता है.

कौशल विकास और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना जरूरी
एक अन्य अर्थशास्त्री प्रोफेसर डीके भट्टाचार्य कहते हैं, “इस समस्या के समाधान के लिए कौशल विकास और लघु उद्योगों को बढ़ावा देना जरूरी है.” वे कहते हैं कि युवाओं को नौकरी के लायक बनाने के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग के जरिये कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए. इसके साथ ही उद्योगों व तकनीकी संस्थानों में बेहतर तालमेल जरूरी है. विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद कौशल विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे जरूर किए थे लेकिन अब तक उसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है.

बेरोजगारों का दुश्मन, रीढ़विहीन पत्रकारिता का अखबार “नंबर वन”
अगर झाँसी, उत्तर प्रदेश के मानव कल्याण विकासवादी संस्थान जैसे कार्यालयों में उनकी सुनवाई हो भी रही है तो शहर के कुछ सफेदपोश, दलाली से अपना घर चलाने वाले कुछ चंद वकील, पत्रकार एवं बिकाऊ गोदी मीडिया, एनजीओ की राह में रोड़े अटका रहा है. देश का नंबर वन होने का दावा करने वाला ब्राह्मणवादी मानसिकता का गुलाम यह अखबार पत्रकारिता के मानक मूल्यों पर इतना रीढ़विहीन है कि यह जिसके खिलाफ खबर छापता है उसी का नाम नहीं छापता है. जाहिर है यह जहर उगलना तो जानता है लेकिन अपने खिलाफ किसी तरह के एक्शन से, कोई उसे कोर्ट में घसीटकर सबक न सिखा दे, इससे डरता है. देश-समाज में जहाँ लीडर मीडिया घरानों की छाँवतले ऐसी नपुंसक पत्रकारिता चल रही हो वहां फ़ासीवादी सरकार और इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी से क्या उम्मीद की जा सकती है.

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