श्रद्धांजलि: भारत के पहले सुपरस्टार गायक थे के एल सहगल

श्रद्धांजलि: भारत के पहले सुपरस्टार गायक थे के एल सहगल

आज (11 अप्रेल, 2018) भारत के पहले सुपरस्टार गायक के एल सहगल की 114 वीं बरसी है. कहा जाता है कि कुंदन लाल सहगल (के एल सहगल) अपने समय के भारत के पहले सुपरस्टार थे. इसका कारण है कि अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने संगीत जगत को कई आयाम दिए. के एल सहगल ने ‘मोहब्बत के आंसू’, ‘जिंदा लाश’ और ‘सुबह का सितारा’ जैसी फिल्मों में अभिनय भी किया. उन्होंने साल 1935 में पी सी बरुआ की फिल्म ‘देवदास’ में मुख्य किरदार निभाया. इसमें गाये उनके गीत ‘बालम आये बसो..’ और ‘दुख के दिन अब बीतत नाही’ को भारतीय सिनेमा में ‘मील का पत्थर’ कहा जाता है.

मुंबई: कुंदन लाल सहगल (के एल सहगल) अपने समय के भारत के पहले सुपरस्टार थे. इसका कारण है कि अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने संगीत जगत को कई आयाम दिए. अपने 15 वर्ष के करियर में ही भारतीय संगीत और सिनेमा को शिखर पर ले जाने वाले कुंदन लाल सहगल को कुंदन बनाने वाले जम्मू के हकीम परशुराम नागर थे। जम्मू में पले बडे़ हुए कुंदन लाल सहगल को शुरू के दिनों में संगीत विद्यालय और परशुराम नागर का सानिध्य मिला।

जन्म: 11 अप्रैल, 1904 – मृत्यु: 18 जनवरी, 1947
जम्मू में 11 अप्रैल 1904 को जन्मे कुंदनलाल सहगल ने अपने 15 साल के छोटे से सिनेमा करियर में 185 गीत गाये और उनके गीत आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं. उन्होंने हिंदी, उर्दू, बंगाली, पंजाबी, तमिल और पर्शियन भाषाओं में गीत गाए.

गानों में होता था गहरा और तंज भरा मैसेज
के एल सहगल ने ‘एक बंगला बने न्यारा, रहे कुनबा जिसमें सारा..’ से रिश्तों को एक सूत्र में पिरोया तो दूसरी ओर अपनी आवाज में दर्द को बयान करते हुए ‘हाय हाय ये जालिम जमाना’ से दुनिया की कड़वी सच्चाई को सामने रखा. ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ से जहां उन्होंने घर छूटने के गम को सुनाया तो ‘बालम आये बसो मेरे मन में’ से मुहब्बत की किलकारियों को गूंज दी.

इन्होंने सहगल को बनाया कुंदन
सूफी दरवेश सलमान यूसुफ से उन्हें सूफियाना ढंग की गायिकी का गुर मिला। बेशक सीखने की ललक सहगल में बचपन से ही थी, लेकिन उन्हें मंच हकीम परशुराम नागर ने प्रदान किया। उन्होंने श्री सनातन धर्म नाटक समाज की स्थापना की। वहां मंचित राम लीला में उन्हें अभिनय करने का मौका मिला। उन दिनों गाने भी कलाकारों को ही गाने होते थे। इसके चलते उन्हें गाने का भी भरपूर मौका मिला। यह सहगल ने फिल्म अभिनेता बनने के बाद परशुराम नागर से हुए पत्राचार में भी माना है। सहगल ने परशुराम नागर की शादी में भी गाना गाया। इसका जिक्र परशुराम नागर सहगल के सुपर स्टार बनने के बाद लोगों से बडे़ गर्व से किया करते थे। इसका खुलासा सुरजीत ¨सह ने अपनी पुस्तक द ग्रेट पीपल ऑफ जम्मू-कश्मीर में भी किया है।

थिएटर से जन्मा एक गायक और अभिनेता
हकीम परशुराम की बड़ी पोती ललिता मेहता और सरोज नागर ने बताया कि उनके घर में बचपन से ही वह कुंदन लाल सहगल की बातें सुनते रहे हैं। दादाजी बताते थे कि कुंदन का बड़ा भाई राम लाल सहगल लक्ष्मण की भूमिका निभाते थे। वह सीता की भूमिका निभाते थे। स्टार बनने के बाद भी उनके जो पत्र आते थे, उनमें दोस्तों मित्रों को रामलीला के पात्रों के नाम से ही संबोधित किया गया होता था। जब उनसे पूछा जाता कि क्या सहगल स्टार बनने के बाद कभी जम्मू आए तो वह खामोश हो जाया करते। हास्य कलाकार ओम प्रकाश जरूर स्टार बनने के बाद भी उनके पास आए।

यादगार फिल्म बनी देवदास
ज्ञातव्य है कि ओम प्रकाश भी श्री सनातन धर्म नाटक समाज में सीता की भूमिका निभाते रहे। वह अक्सर कहा करते थे कि सहगल के जम्मू से जाने के बाद उनके क्लब को जरूर नुकसान हुआ, लेकिन देश को स्टार मिला गया। वर्ष 1935 में बनी उनकी फिल्म देवदास में उन्होंने जो भूमिका निभाई है, उसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। उनके गाए गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। 15 वर्ष के करियर में सहगल ने 36 फिल्मों में अभिनय किया। इनमें से 28 फिल्में हिन्दी, सात बंगाली और एक तमिल में है। उन्होंने 185 गाने लिखे जिनमें 142 फिल्मी गाने हैं। वह भजन, गजल, होरी आदि भी गाते थे। उन्होंने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश, किशोर कुमार व अन्य गायकों के साथ भी गाने गाए।

कलाकारों के प्रेरणास्त्रोत
सनातन धर्म नाटक समाज के अध्यक्ष युद्धवीर सेठी कहते हैं, आज भी क्लब के कलाकार उन्हें अपना प्रेरणास्त्रोत मानते हैं। उनके समय क्लब के पास माइक नहीं हुआ करते थे, लेकिन जब वह संवाद बोलते या कोई गाना सुनाते तो बाजार तक सुनाई देता था। उनसे जुड़ी यादें समय के साथ लोक कथा की तरह आगे बढ़ती जा रही है। दीवाना मंदिर के किसी भी कलाकार से बात करो तो वह बडे़ गर्व से कहता है सहगल का पहला मंच यही है।

जन्मदिन को लेकर संशय
हकीम परशुराम की पोती ललिता मेहता ने बताया कि उनकी बहुत सी महिलाओं से बात हुई जो कहती थी कि सहगल मंदिर में होने वाले कीर्तन में भी मौका मिलने पर चूकते नहीं थे। उनके जन्मदिन को लेकर संशय है। कुछ लोग उनका जन्मदिन 4 अप्रैल तो कुछ 11 अप्रैल को मनाते हैं। कुंदन लाल सहगल के गाए गीत आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं। जब भी जम्मू के संगीत या अभिनय की बात होती है तो लोग सहगल का नाम बडे़ आदर से लेते हैं।

जनाजे में बजे गाना यही थी चाहत
“जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे” ये गाना अक्सर दर्द में डूबे आशिक के म्यूजिक प्ले लिस्ट में या फिर उसके मुंह से सुनने को मिल जाती है. ये गाना 72 साल पहले हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पहले सुपरस्टार कहे जाने वाले के एल सहगल ने गया था. जी हां, आज भारतीय सिनेमा जगत के पहले ‘सुपर स्टार’ कहे जाने वाले के एल सहगल का जन्मदिन है.

‘जब दिल ही टूट गया’
1946 में नौशाद साहब ने फिल्म शाहजहां का संगीत तैयार किया, लेकिन आवाज के एल सहगल की थी. एल सहगल का गाना ‘जब दिल ही टूट गया’ को लेकर एक किस्सा बहुत मशहूर है. कहते हैं कि सहगल साहब बिना पिए गाते नहीं थे, लेकिन फिल्म शाहजहां के लिए ‘जब दिल ही टूट गया’ गाना था तब के एल सहगल ने बिना पिए गया. यही नहीं ये गाना पहली बार में ही सबको पसंद भी आया. के एल सहगल ने इस गाने के बाद कहा था कि मेरे जनाजे में ‘जब दिल ही टूट गया…’ गाना बजना चाहिए. और हुआ भी ऐसा ही.

फिल्म में भी आजमाया हाथ
के एल सहगल ने ‘मोहब्बत के आंसू’, ‘जिंदा लाश’ और ‘सुबह का सितारा’ जैसी फिल्मों में अभिनय भी किया. उन्होंने साल 1935 में पी सी बरुआ की फिल्म ‘देवदास’ में मुख्य किरदार निभाया. इसमें गाये उनके गीत ‘बालम आये बसो..’ और ‘दुख के दिन अब बीतत नाही’ को भारतीय सिनेमा में ‘मील का पत्थर’ कहा जाता है. ‘प्रेसीडेंट’ को उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक कहा जाता है जिसका गीत ‘एक बंगला बने..’ इतिहास के पन्नों में अमर हो गया. इसकी कामयाबी के बाद वह बतौर गायक शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे.

भजन की दुनिया में भी किये जाते हैं याद
उनकी मां धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ गीत-संगीत में भी काफी रूचि रखती थी. सहगल अक्सर अपनी मां के साथ भजन-कीर्तन जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में जाया करते थे और अपने शहर में हो रही रामलीला में भी हिस्सा लेते थे. ‘मधुकर श्याम हमारे चोर’, ‘सिर पर कदम्ब की छैयां’ (राग भैरवी), ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो’ जैसे यादगार भजनों ने उन्हें खूब इज्जत दिलाई.

रेलवे की नौकरी से सिनेमा तक का सफर
उन्होंने जीवन यापन के लिए रेलवे में साधारण सी नौकरी भी की. साल 1930 में कोलकाता के न्यू थिएटर के बी एन सरकार ने सहगल को अपने यहां काम करने का मौका दिया. वहां उनकी मुलाकात आर सी बोराल से हुई जो सहगल की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए. धीरे-धीरे सहगल अपनी पहचान बनाते चले गए. आखिरकार साल 1947 में 42 साल की उम्र में सहगल ने दुनिया को अलविदा कह दिया और उनके प्रशंसकों का ‘जब दिल ही टूट गया….’

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