यदि सरकार ने मान ली हैं अन्ना की सभी मांगे फिर किसान क्यों नाराज हैं

दि सरकार ने मान ली हैं अन्ना की सभी मांगे फिर किसान क्यों नाराज हैं

-23 मार्च को दिल्ली में शुरू किया था अनशन, लेकिन विपक्ष का नहीं मिला साथ, लोग भी रहे आंदोलन से दूर
-लोकपाल और किसानों की थीं मांगें लेकिन सरकार ने नहीं दी कोई तवज्‍जो
-फडणवीस ने जूस पिलाकर खत्म कराया अनशन, बजट में हो चुकी है एमएसपी बढ़ाने की घोषणा
-मोदी सरकार लोकपाल पर 4 साल से दे रही है थोथे आश्‍वासन

सात दिनों से अनशन पर बैठे अन्ना हजारे ने सरकार द्वारा मांगें मानी जाने के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया. अन्ना हजारे ने 23 मार्च को किसानों की समस्याओं और लोकपाल कानून को लेकर अनशन शुरू किया था. इस अनशन की उन्होंने पिछले साल ही घोषणा कर दी थी. हालांकि अगर अन्‍ना के इस आंदोलन की तुलना उनके 2011 में दिल्‍ली और मुंबई के आंदोलन से करें तो यह काफी फीकी साबित हुई. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि मजबूरी में तो अन्‍ना ने आंदोलन खत्‍म नहीं किया. यदि सरकार ने मान ली हैं अन्ना की सभी मांगे फिर किसान क्यों नाराज हैं?

लोकपाल आंदोलन का चेहरा हजारे
अन्ना ने 23 मार्च को किसानों की समस्याओं और लोकपाल कानून को लेकर अनशन शुरू किया था. इस अनशन के बारे में उन्होंने पिछले साल ही घोषणा कर दी थी. बीते वर्ष 29 नवंबर को उन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के रालेगण सिद्धि गांव में अपने समर्थकों की एक बैठक को संबोधित करते हुए कहा था कि वह जनलोकपाल और किसानों के मुद्दों को लेकर अगले साल (वर्ष 2018) दिल्ली में 23 मार्च से आंदोलन शुरू करेंगे. लोकपाल आंदोलन का चेहरा रहे हजारे ने कहा कि उन्होंने आंदोलन शुरू करने के लिए 23 मार्च की तारीख चुनी, क्योंकि उस दिन ‘शहीद दिवस’ मनाया जाता है.

अनशन के कारण बिगड़ रही थी तबीयत
अनशन की वजह से अन्ना का वजन 5.5 किलोग्राम तक कम हो चुका है. उनका ब्लड प्रेशर भी 186/100 है जो काफी ज्यादा है. शुगर के स्तर में भी काफी गिरावट आई है. ऐसे में डॉक्टरों द्वारा उन्हें ज्यादा से ज्यादा आराम करने और पानी पीने की सलाह दी गई है. इसके अलावा बुधवार को अन्ना के साथ अनशन कर रहे कई अनशनकारियों की हालत खराब होने पर उन्हें बुधवार को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. अन्ना की लगातार तबीयत बिगड़ती देख सरकार ने उनकी सभी मांगों मान ली हैं. जानकारी के मुताबिक पीएमओ के ड्राफ्ट को अन्‍ना ने मंजूरी दे दी है.

सरकार पर लगाए अनशन रोकने के आरोप
अनशन के दौरान अन्ना हजारे ने आरोप लगाए थे कि केंद्र सरकार उनके अनशन को सफल नहीं होने दे रही है. अनशनकारी दिल्ली ना पहुंचे इसके लिए प्रशासन ने ट्रेनों को रद्द कर दिया गया है. अन्ना ने कहा कि ट्रेनों को रद्द करके सरकार ने किसानों को हिंसा करने के लिए मजबूर कर दिया है. उन्होंने कहा कि आंदोलन पर बैठने से पहले मैंने कई खत लिखकर कहा कि मुझे किसी तरह के पुलिस प्रोटेक्शन की आवश्यता नहीं है.

जन समर्थन मिलता भी दिखाई नहीं दि‍या
अन्ना के आंदोलन को 2011 जैसा जन समर्थन मिलता भी दिखाई नहीं दि‍या. 2011 में अन्‍ना आंदोलन से कई संस्‍था और लाखों लोग जुड़े थे. दिल्‍ली के साथ देश के अन्‍य हिस्‍सों में भी लोगों ने भूख हड़ताल कर इस आंदोलन को समर्थन दिया था. हालांकि इस बार नजारा उल्‍टा था. अन्‍ना को अपने टेंट को ही भरने में सफलता नहीं मिली. वहीं अन्‍ना जिन किसानों की मांगों को भी शामिल कर यह आंदोलन कर रहे थे, उनके ही कई संगठनों ने इस आंदोलन से दूरी बनाई थी. अगर ऐसा नहीं होता तो जो किसान महाराष्‍ट्र में पदयात्रा कर पूरे देश का ध्‍यान खींच रहे थे, अपने ही महाराष्‍ट्र के जननेता के आंदोलन के लिए दिल्‍ली नहीं पहुंचते. लोगों की इस आंदोलन में भागीदारी नहीं होने से भी अन्ना को इस आंदोलन की हैसियत समझ में आ गई. पिछली बार जहां सोशल मीडिया पर अन्ना के आंदोलन को काफी समर्थन मिला था, लेकिन इस बार तो उनके आंदोलन का मजाक बनाया जा रहा था. अन्ना ने इसे लेकर अपना दर्द भी जाहिर किया था.

किसानों को प्रतिमाह 5 हजार रुपये पेंशन का बड़ा वादा
अन्‍ना आंदोलन शुरू करते हुए यह मांग की थी कि खेती पर निर्भर 60 साल से ऊपर उम्र वाले किसानों को प्रतिमाह 5 हजार रुपये पेंशन मिले. कृषि मूल्य आयोग को संवैधानिक दर्जा तथा सम्पूर्ण स्वायत्तता मिले. इस पर कुछ नहीं कहा गया. वहीं, अन्‍ना ने तो साफ मांग की थी कि लोकपाल विधेयक पारित हो और लोकपाल कानून तुरंत लागू किया जाए. हर राज्य में सक्षम लोकायुक्त नियुक्‍त किया जाए. हालांकि बस आश्‍वासन पर उन्‍होंने आंदोलन खत्‍म कर दिया.

मोदी सरकार पर मढ़ा आंदोलन रोकने का आरोप
2011 के अन्‍ना आंदोलन के दौरान तत्‍कालीन यूपीए सरकार लगातार अन्‍ना और उनके आंदोलन की कमेटी से बातचीत कर रही थी. उस समय लगातार केंद्र सरकार का प्रयास था कि अन्‍ना आंदोलन तोड़ दें. यूपीए के कई मंत्री लगातार अन्‍ना से बात कर रहे थे और आंदोलन पर नजर बनाए हुए थे. साथ ही यूपीए सरकार को अन्‍ना की कई मांगों के सामने झुकना भी पड़ा था. हालांकि इस बार ऐसा कोई नजारा नहीं दिखा. पीएमओ की ओर से अन्‍ना के आंदोलन को खत्‍म करने को लेकर कुछ प्रयास जरूर हुए, लेकिन कोई भी मंत्री या नेता अन्‍ना के इस आंदोलन पर न पहुंचा और न ही कोई बयान देता दिखाई दिया.

ये थीं अन्‍ना की अन्य मांगें
– किसानों के कृषि उपज की लागत के आधार पर डेढ़ गुना ज्‍यादा दाम मिले.
– खेती पर निर्भर 60 साल से ऊपर उम्र वाले किसानों को प्रतिमाह 5 हजार रुपये पेंशन.
– कृषि मूल्य आयोग को संवैधानिक दर्जा तथा सम्पूर्ण स्वायत्तता मिले.
– लोकपाल विधेयक पारित हो और लोकपाल कानून तुरंत लागू किया जाए.
– लोकपाल कानून को कमजोर करने वाली धारा 44 और धारा 63 का संशोधन तुरंत रद्द हो.
– हर राज्य में सक्षम लोकायुक्त नियुक्‍त किया जाए.
– चुनाव सुधार के लिए सही निर्णय लिया जाए.

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