समाजसेवी संस्था को सहयोग करने की बजाय ब्लैकमेल कर लूटने की साजिश

समाजसेवी संस्था को सहयोग करने की बजाय ब्लैकमेल कर लूटने की साजिश

दबंगई व निरंकुशतापूर्ण कार्यवाही से आहत हैं सैकड़ों परिवार | संस्थान को लेकर जिम्मेदारों का तानाशाही रवैया दुर्भाग्यपूर्ण | संस्थान की नीयत में नहीं बल्कि विरोधियों की नीयत में है खोट | संस्थान के पत्र पर PMO कार्यालय, भारत सरकार की पावती संस्थापक की नीयत और उद्देश्य को करती है स्पष्ट

झाँसी: विगत माह झाँसी शहर में संचालित एक समाजसेवी संस्थान पर झाँसी प्रशासन द्वारा बहुत ही मनमाने तरीके से सख्त कार्यवाही करते हुए संस्थान को बन्द करने का तुगलकी फरमान सुना दिया गया। प्रशासन की इस बेबुनियादी व मनमाने तरीके से की गयी कार्यवाही से बन्देलखण्ड के हजारों परिवार आहत हो गए हैं, बेरोजगार सैकड़ों परिवार के लोग जिन्हें इस संस्थान ने समाज सेवा सम्बन्धी कार्यों के लिए अपना कर्मचारी बनाया था। अब रोजगार छिन जाने से वह सड़क पर आ गए हैं लेकिन समाज सेवा और भ्रष्ट तंत्र से लड़ने का जज्बा आज भी उनके दिलों में कायम है।
यदि संस्थान के उद्देश्य और संस्थापक की मंशा को समझना है तो संस्थान के उस लेटरपैड को देखिये जिस पर वर्ष 2015 में पीएमओ, भारत सरकार की पावती दर्ज है। लेकिन अफ़सोस देश की दशा और दिशा बदलने की नीयत से कार्य करने वाली इस संस्था पर झाँसी प्रशासन द्वारा बेबुनियादी झूठे आरोप लगाकर दमनात्मक कार्यवाही कर डाली।
इस कार्यवाही से समाजसेवा व देश के प्रति समर्पित भाव रखने वाले संस्थान के हेड (संस्थापक अध्यक्ष) को काफी चोट पहुची है। लेकिन संस्थापक जी के इरादे कल भी बुलंद थे और आज भी, उन्होंने इस कार्यवाही को आमतौर पर राह में आने वाली बाधाओं में से ही एक बाधा मानते हुए अपना कार्य जारी रखा है।
झाँसी प्रशासन की इस दमनकारी और बेबुनियादी कार्यवाही के विरोध में वह सब परिवार खड़े हो गए हैं जिन्हें अपने घर चलाने के लिए रोजगार मिल गया था। संस्था अपने कर्मचारियों के सहयोग से ही आगे बढ़ रही थी लेकिन संस्थान के बढ़ते कदम और क्षेत्रीय लोकप्रियता स्थानीय जनप्रतिनिधियों को खटकने लगी थी। वह नहीं चाहते थे कि बुन्देलखण्ड में उनके बैनर से बड़ा कोई और बैनर सामने आये तो गिद्द की तरह टकटकी नजर गढ़ाए बैठे सत्ता की हनक दिखाते हुए एक राजनेता ने प्रशासन को बैनर का नामोनिशान मिटाने का फरमान सुनाते हुए कार्यवाही करवा दी जो बेहद अफसोसजनक कार्यवाही है।
जिस संस्थान का संस्थापक अपनी मंशा और संस्थान के उद्देश्य बताने के लिए खुद प्रधानमंत्री को आमंत्रण भेजता है भले ही उस आमंत्रण पर पर पीएमओ कार्यालय ने कोई विचार नहीं किया हो लेकिन संस्था के हेड की मंशा साफ साफ स्पष्ट हो जाती है।
वर्तमान में अधिकतम NGO समाजसेवा का उद्देश्य लेकर नहीं बल्कि समाजसेवा की आड़ में झूठा दिखावा करते हुए सरकारी फंडिंग का दुरूपयोग कर रहे है। अधिकतम NGO आपको ऐसे मिलेंगे जो न तो अपनी मंशा साफ रखते न स्पष्ट उद्देश्य फिर भी ऐसे चोर NGO को लेकर मीडिया भी चुप है और प्रशासन भी अनजान बना हुआ है।

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