आज जमकर मनाई जा रही होली, कई जगहों की अपनी अलग है परंपरा

आज जमकर मनाई जा रही होली, कई जगहों की अपनी अलग है परंपरा

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है।

मुंबई: होलिका दहन के साथ ही देश का कोना-कोना रंगों की फुहार में तर हो गया है। आज धुलेंडी पर रंगों का खुमार हर खासो-आम पर जमकर दिखाई दे रहा है। काशी में विश्वनाथ, उज्जैन में महाकाल और वृंदावन में बांकेबिहारी संग रंग खेलने को हुरियारों का रैला उमड़ पड़ा है।

जमीन से आसमान तक रंगीन बांकेबिहारी का आंगन

गुरुवार से ही ठा. बांकेबिहारी के आंगन में जमीन से लेकर आसमान तक रंगीन नजर आ रहा है। सुबह से श्रद्धालुओं ने जमकर उल्लास का आनंद ले रहे हैं। छटीकरा स्थित प्रियाकांतजू मंदिर में उमड़ी भीड़ पर हाइड्रोलिक पिचकारी से टेसू के रंगों की बरसात हो रही है। मंदिर में लठामार होली से लेकर लड्डू होली और रसिया गायन का हजारों श्रद्धालुओं ने आनंद उठाया। मथुरा में चतुर्वेदी समाज द्वारा डोला निकाला गया। द्वारिकाधीश महाराज की झांकी, बैलगाड़ी पर सवार युवा व उसके पीछे बैंड की मधुर धुन पर देशी व विदेशी भक्त रंग में रंगे नृत्य करने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं।

आरती में पुजारियों ने राजाधिराज को चढ़ाया गुलाल

उज्जैन स्थित राजाधिराज महाकाल के आंगन में भी फागुन के रंग जमकर बरस रहे हैं। गुरुवार को संध्या आरती में पुजारियों ने भगवान को वासंती पुष्प व गुलाल अर्पित किया। देश-विदेश से आए भक्त राजा के रंग में नजर आ रहे हैं। इससे पूर्व गोधूलि वेला में मंदिर परिसर में पुजारी परिवार की महिलाओं ने होलिका का पूजन किया। फिर होलिका दहन किया गया। महाकाल की होली के दर्शन के लिए हजारों भक्त उमड़ पड़े हैं। धुलेंडी पर शुक्रवार को सबसे पहले भस्मारती में महाकाल में रंग पर्व मनाया गया। पुजारी और भक्त भगवान के साथ गुलाल होली खेल रहे हैं। इसके बाद नगर में उत्सव मनाया जाएगा।

पलाश के फूलों में डालते हैं इत्र

मप्र के होशंगाबाद के आर्ष गुरुकुल में पलाश के फूलों को उबालकर रंग बनाया जाता है और रंग में इत्र डालकर होली मनाते हैं। गुरकुल के प्रधानाचार्य सत्यसिंघु महाराज बताते हैं यहां 106 वर्ष से गुरकुल स्थापित है। प्राचीन परंपरा अनुसार प्राकृतिक रूप से पलाश के फूलों का रंग बनाया जाता है। इसमें मोगरा आदि का इत्र शामिल करते हैं। फिर एक-दूसरे पर रंग डाला जाता है।

ढोल-मंजीरे बजाते निकलती है टोली

सागर में लोगों का समूह ढोल-मंजीरे बजाते हुए होली की शुभकामनाएं देता है। सदर निवासी हरदयाल बताते हैं कि होलिका दहन के दूसरे दिन सुबह से लोग एकत्रित होकर ढोल-मंजीरे के साथ फाग गीत गाते हैं। जिस किसी परिवार में शोक होता है, तो उस घर पर जाकर समूह के लोग रंग-गुलाल लगाते हैं। इसके बाद शोकाकुल परिवार होली उत्सव मनाता है।

यहां होती है रावण की पूजा

विदिशा जिले की नटेरन तहसील के रावण गांव में रावण बाबा की पूजा कर होली उत्सव मनाया जाता है। यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी बताई जाती है। ग्राम के ब्रजेश कुमार बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने यहां रावण बाबा का मंदिर बनाया है। होली पर गांव के सभी लोग एकत्र होकर पहले मंदिरों में पूजन करते हैं। बाद में फाग खेलते हैं। यहां के रावण को वेदों का प्रकांड विद्वान मानते हुए सम्मान दिया जाता है।

लगता है मेघनाद मेला

बैतूल जिले के मुलताई, सारणी, आमला और चिचोली क्षेत्र में मेघनाद मेला लगता है। मेघनाद के रूप में लोग लक़़डी का खंभा स्थापित कर पहले पूजन करते हैं बाद में एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाने का दौर चलता है। चिचोली के मनीराम इमले बताते हैं कि यह प्राचीन परंपरा है। फागोत्सव को लोग मेघनाद पूजन के बाद मनाते हैं। यहां मेला भी लगता है जिसमें ब़़डी संख्या में ग्रामीणजन एकत्रित होते हैं।

छग के दो गांव में तिथि नहीं दिन देखकर उड़ता है गुलाल

छत्तीसगढ़ के कोरबा के ग्राम जोगीपाली में जहां सिर्फ शुक्रवार के दिन पड़ने वाली होली पर ही रंग खेलने का रिवाज है, वहीं बासीन में पर्व के बाद पड़ने वाले सोमवार को रंग-गुलाल उड़ाया जाता है। पिछले आठ पीढ़ी से चली आ रही परंपरा का अनुसरण आज भी जारी है। शुक्रवार को जिलेभर में धूमधाम से होली का त्योहार मनाया जा रहा है। इस परंपरा के विपरीत कुछ गांव ऐसे भी हैं, जहां अलग मान्यता है। जोगीपाली भी कुछ ऐसी ही मान्यता वाला गांव है, जहां केवल शुक्रवार के दिन पड़ने वाली होली मनाई जाती है। अगर शुक्रवार के अलावा किसी और दिन होली पड़ी तो यहां के ग्रामीण होली ही नहीं मनाते। इसी तरह ग्राम बासिन में केवल सोमवार को होली खेली जाती है। होली चाहे जिस भी दिन प़़डे, वे उसके बाद आने वाले सोमवार को रंग खेलते हैं। लिहाजा इस बार बासीन के ग्रामीण होली के तीन दिन बाद यानी सोमवार को होली मनाएंगे।

पेड़ कटाई अपशकुन, इसलिए दहन नहीं

करतला विकासखंड के ग्राम पठियापाली व मड़वारानी के ग्राम खरहरी में होलिका दहन पर सख्त पाबंदी है। ग्रामीणों के अनुसार बुजुर्गो ने ही पूरे गांव की सहमति से वर्षो पहले यह नियम बनाया। इस गांव में डंगाहिन देवी की पूजा होती है। उनकी मान्यता है कि जंगल में पेड़ कटाई करने पर देवी रुष्ट हो जाती है और पूरे गांव को उनके प्रकोप का भागी बनना पड़ता है।

यहां होली परंपराओं का त्योहार,नवेली दुल्हन को होली में छुपाने की है परंपरा

वनवासी बाहुल्य जशपुर जिले में होली रंगों नहीं, परंपरागत रीति-रिवाजों का अनूठा संगम है। कहीं सगाई के बाद शादी का इंतजार कर रहे युवक-युवतियों के लिए होली में शामिल होना प्रतिबंधित है, तो कहीं नवविवाहिता को ऐसे समय में छुपा दिया जाता है। देवर भाभियों को ढूंढते हैं। सोच होती है कि नवेली दुल्हन को किसी की नजर न लगे। वनवासी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदेव राम उरांव बताते हैं जनजातीय परंपरा में होली पर हडिया, शराब की बलि चढ़ाते हैं। नए पूल और पलों भी शामिल किया जाता है। महुआ, जिरहुल, कचनार आदि के पौधे सुरक्षित रखे जाते हैं, जिसका उपयोग इस खास दिन पर होता है।

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